सुनहरी बेड़ियाँ
यह कविता लिखना बहुत ही दुखद था|
दुःख इस बात का नहीं था कि सब चुप हैं|
दुःख इस बात का था कि मैं भी चुप हूँ|
इसी चुप्पी को तोड़ने की एक कोशिश है यह कविता पर मुझे पता है की यह सन्नाटा टूटेगा नहीं
इसलिए नहीं की हम असक्षम है परन्तु इसलिए
क्यूंकि हम डरते हैं
किसी और से नहीं.. बल्कि खुद अपने आप से
अपनी कमज़ोरियों से|
अपनी ही कमज़ोरियों की सुनहरी बेडियाँ पहन रखीं है हमने
और खुद अपने आप से लड़ना बहुत दुखद है|

रौशनी को ढूँढता हूँ अपनी आखें मीच के,
छिप रहा हूँ अपनी ही परछाइयों के बीच में|
लहू की लाली फीकी है, अब पानी बहता नव्जों में,
शोले दिल में हैं मगर बस चिंगारियां है लव्जों मे|
कीर्ति का कर थामकर, कर्त्तव्य का कर भूलकर,
कौरियों के वृक्ष रोपुं कृतघ्नता के मूल पर|
धन है, यश है, ज्ञान है, समाज मे सम्मान है,
स्व, स्वयं, मा, मम, अहम् मे खो गया इंसान है|
इमारतों की खिड़कियों से झाँक कर जब देखता हूँ,
जलते घरों की तपिश से बंद हाथों को सेंकता हूँ|
खून की बारिशों के छींटें सन गए है वस्त्रों पर,
जंग करने चले कलम से, ज़ंग लगे है शस्त्रों पर|
मातृभूमि की वह ममता, मातम के तम मे लुप्त है,
मत की कीमत मोतियों मे, मौत मिलता मुफ्त है|
उँगलियाँ सब उठ चुकी अब फैसले का वक़्त है,
उँगलियों की मुट्ठियाँ बनती नहीं, सब व्यस्त हैं|
क्रांति के वह लेख कागज़ की कश्तियों मे बह गए,
कर्म का कर विसर्जन, अर्थ अर्जन करते रह गए|
चीखते तो हैं सभी की हौसले बुलंद है,
त्याग पथ पर कौन जाये, इस बात पर बस द्वंद है|
युद्ध भूमि तक पहुँचने से पहले ही हार रहा हूँ,
मूक इस आवाज़ से उस रण ध्वनि को पुकार रहा हूँ|
आईने के सामने एक मृत शरीर सा दीखता हूँ,
बेड़ियाँ हैं हाथों में पर क्रांति काव्य लिखता हूँ |
बेड़ियाँ हैं हाथों में पर क्रांति काव्य लिखता हूँ |

Awesome creation!! Really a smooth poem..
Virodhabhas se susajjit kavya..